॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.32.12
शरच्चन्द्रांशुसन्दोहध्वस्तदोषातमः शिवम्।
कृष्णाया हस्ततरलाचितकोमलवालुकम्॥ १२
śaraccandrāṃśusandohadhvastadoṣātamaḥ śivam|
kṛṣṇāyā hastataralācitakomalavālukam|| 12
अर्थ
शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी चाँदनी अपनी निराली ही छटा दिखला रही थी। उसके कारण रात्रिके अन्धकारका तो कहीं पता ही न था, सर्वत्र आनन्द-मंगलका ही साम्राज्य छाया था। वह पुलिन क्या था, यमुनाजीने स्वयं अपनी लहरोंके हाथों भगवान्की लीलाके लिये सुकोमल बालुकाका रंगमंच बना रखा था॥ १२॥✎ 1432