श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

शरच्चन्द्रांशुसन्दोहध्वस्तदोषातमः शिवम्।

कृष्णाया हस्ततरलाचितकोमलवालुकम्॥ १२

śaraccandrāṃśusandohadhvastadoṣātamaḥ śivam|

kṛṣṇāyā hastataralācitakomalavālukam|| 12

अर्थ

शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी चाँदनी अपनी निराली ही छटा दिखला रही थी। उसके कारण रात्रिके अन्धकारका तो कहीं पता ही न था, सर्वत्र आनन्द-मंगलका ही साम्राज्य छाया था। वह पुलिन क्या था, यमुनाजीने स्वयं अपनी लहरोंके हाथों भगवान्‌की लीलाके लिये सुकोमल बालुकाका रंगमंच बना रखा था॥ १२॥✎ 1432

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1432 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महकसे → महँकसे

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