॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.30.43
ततोऽविशन् वनं चन्द्रज्योत्स्ना यावद् विभाव्यते।
तमः प्रविष्टमालक्ष्य ततो निववृतुः स्त्रियः॥ ४३
tato'viśan vanaṃ candrajyotsnā yāvad vibhāvyate|
tamaḥ praviṣṭamālakṣya tato nivavṛtuḥ striyaḥ|| 43
अर्थ
इसके बाद वनमें जहाँतक चन्द्रदेवकी चाँदनी छिटक रही थी, वहाँतक वे उन्हें ढूँढ़ती हुई गयीं। परन्तु जब उन्होंने देखा कि आगे घना अन्धकार है—घोर जंगल है—हम ढूँढ़ती जायँगी तो श्रीकृष्ण और भी उसके अंदर घुस जायँगे, तब वे उधरसे लौट आयीं॥ ४३॥