श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

तया कथितमाकर्ण्य मानप्राप्तिं च माधवात्।

अवमानं च दौरात्म्याद् विस्मयं परमं ययुः॥ ४२

tayā kathitamākarṇya mānaprāptiṃ ca mādhavāt|

avamānaṃ ca daurātmyād vismayaṃ paramaṃ yayuḥ|| 42

अर्थ

जब उन्होंने उसे जगाया, तब उसने भगवान् श्रीकृष्णसे उसे जो प्यार और सम्मान प्राप्त हुआ था, वह उनको सुनाया। उसने यह भी कहा कि ‘मैंने कुटिलतावश उनका अपमान किया, इसीसे वे अन्तर्धान हो गये।’ उसकी बात सुनकर गोपियोंके आश्‍चर्यकी सीमा न रही॥ ४२॥

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