॥ श्रीहरिः ॥
कस्यांचित् स्वभुजं न्यस्य चलन्त्याहापरा ननु।
कृष्णोऽहं पश्यत गतिं ललितामिति तन्मनाः॥ १९
kasyāṃcit svabhujaṃ nyasya calantyāhāparā nanu|
kṛṣṇo'haṃ paśyata gatiṃ lalitāmiti tanmanāḥ|| 19
अर्थ
एक गोपी अपनेको श्रीकृष्ण समझकर दूसरी सखीके गलेमें बाँह डालकर चलती और गोपियोंसे कहने लगती—‘मित्रो! मैं श्रीकृष्ण हूँ। तुमलोग मेरी यह मनोहर चाल देखो’॥ १९॥✎ 1431
कस्यांचित् स्वभुजं न्यस्य चलन्त्याहापरा ननु।
कृष्णोऽहं पश्यत गतिं ललितामिति तन्मनाः॥ १९
एक गोपी अपनेको श्रीकृष्ण समझकर दूसरी सखीके गलेमें बाँह डालकर चलती और गोपियोंसे कहने लगती—‘मित्रो! मैं श्रीकृष्ण हूँ। तुमलोग मेरी यह मनोहर चाल देखो’॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.30.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 319) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1431 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): लगी। → लगीं।