श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

निशीथे तमउद्भूते जायमाने जनार्दने।

देवक्यां देवरूपिण्यां विष्णुः सर्वगुहाशयः१।

आविरासीद् यथा प्राच्यां दिशीन्दुरिव पुष्कलः॥ ८

niśīthe tamaüdbhūte jāyamāne janārdane|

devakyāṃ devarūpiṇyāṃ viṣṇuḥ sarvaguhāśayaḥ|

āvirāsīd yathā prācyāṃ diśīnduriva puṣkalaḥ|| 8

अर्थ

जन्म-मृत्युके चक्रसे छुड़ानेवाले जनार्दनके अवतारका समय था निशीथ। चारों ओर अन्धकारका साम्राज्य था। उसी समय सबके हृदयमें विराजमान भगवान् विष्णु देवरूपिणी देवकीके गर्भसे प्रकट हुए, जैसे पूर्व दिशामें सोलहों कलाओंसे पूर्ण चन्द्रमाका उदय हो गया हो॥ ८॥✎ 1397 2230

टिप्पणियाँ

  1. १

    गुणाश्रयः।

    (मुद्रित पृष्ठ 138)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1397 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): लगेञ्॥ → लगे॥
  • #2230 टिप्पणी: → १. मेघ समुद्रके पास जाकर मन्द-मन्द गर्जना करते हुए कहते—जलनिधे! यह तुम्हारे उपदेश (पास आने) का फल है कि हमारे पास जल-ही-जल हो गया। अब ऐसा कुछ उपदेश करो कि जैसे तुम्हारे भीतर भगवान् रहते हैं, वैसे हमारे भीतर भी रहें।२. बादल समुद्रके पास जाते और कहते कि समुद्र! तुम्हारे हृदयमें भगवान् रहते हैं, हमें भी उनका दर्शन-प्यार प्राप्त करवा दो। समुद्र उन्हें थोड़ा-सा जल देकर कह देता—अपनी उत्ताल तरंगोंसे ढकेल देता—जाओ अभी विश्‍वकी सेवा करके अन्तःकरण शुद्ध करो, तब भगवान्‌के दर्शन होंगे। स्वयं भगवान् मेघश्याम बनकर समुद्रसे बाहर व्रजमें आ रहे हैं। हम धूपमें उनपर छाया करेंगे, अपनी फुइयाँ बरसाकर जीवन न्योछावर करेंगे और उनकी बाँसुरीके स्वरपर ताल देंगे। अपने इस सौभाग्यका अनुसन्धान करके बादल समुद्रके पास पहुँचे और मन्द-मन्द गर्जना करने लगे। मन्द-मन्द इसलिये कि यह ध्वनि प्यारे श्रीकृष्णके कानोंतक न पहुँच जाय।

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