श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

तदा वां परितुष्टोऽहममुना वपुषानघे।

तपसा श्रद्धया नित्यं भक्त्या च हृदि भावितः॥ ३७

tadā vāṃ parituṣṭo'hamamunā vapuṣānaghe|

tapasā śraddhayā nityaṃ bhaktyā ca hṛdi bhāvitaḥ|| 37

अर्थ

पुण्यमयी देवि! उस समय मैं तुम दोनोंपर प्रसन्‍न हुआ। क्योंकि तुम दोनोंने तपस्या, श्रद्धा और प्रेममयी भक्तिसे अपने हृदयमें नित्य-निरन्तर मेरी भावना की थी। उस समय तुम दोनोंकी अभिलाषा पूर्ण करनेके लिये वर देनेवालोंका राजा मैं इसी रूपसे तुम्हारे सामने प्रकट हुआ। जब मैंने कहा कि ‘तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो’, तब तुम दोनोंने मेरे-जैसा पुत्र माँगा॥ ३७-३८॥

यह अर्थ श्लोक 37–38 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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