श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

विश्‍वं यदेतत् स्वतनौ निशान्ते

यथावकाशं पुरुषः परो भवान्।

बिभर्ति सोऽयं मम गर्भगोऽभू-

दहो नृलोकस्य विडम्बनं हि तत्॥ ३१

viśvaṃ yadetat svatanau niśānte

yathāvakāśaṃ puruṣaḥ paro bhavān|

bibharti so'yaṃ mama garbhago'bhū-

daho nṛlokasya viḍambanaṃ hi tat|| 31

अर्थ

प्रलयके समय आप इस सम्पूर्ण विश्‍वको अपने शरीरमें वैसे ही स्वाभाविक रूपसे धारण करते हैं, जैसे कोई मनुष्य अपने शरीरमें रहनेवाले छिद्ररूप आकाशको। वही परम पुरुष परमात्मा आप मेरे गर्भवासी हुए, यह आपकी अद्भुत मनुष्य-लीला नहीं तो और क्या है?॥ ३१॥

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