श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

स त्वं घोरादुग्रसेनात्मजान्‍न-

स्त्राहि त्रस्तान् भृत्यवित्रासहासि।

रूपं चेदं पौरुषं ध्यानधिष्ण्यं

मा प्रत्यक्षं मांसदृशां कृषीष्ठाः॥ २८

sa tvaṃ ghorādugrasenātmajānna-

strāhi trastān bhṛtyavitrāsahāsi|

rūpaṃ cedaṃ pauruṣaṃ dhyānadhiṣṇyaṃ

mā pratyakṣaṃ māṃsadṛśāṃ kṛṣīṣṭhāḥ|| 28

अर्थ

प्रभो! आप हैं भक्तभयहारी। और हमलोग इस दुष्ट कंससे बहुत ही भयभीत हैं। अतः आप हमारी रक्षा कीजिये। आपका यह चतुर्भुज दिव्यरूप ध्यानकी वस्तु है। इसे केवल मांस-मज्जामय शरीरपर ही दृष्टि रखनेवाले देहाभिमानी पुरुषोंके सामने प्रकट मत कीजिये॥ २८॥

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