श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

योऽयं कालस्तस्य तेऽव्यक्तबन्धो

चेष्टामाहुश्‍चेष्टते येन विश्‍वम्।

निमेषादिर्वत्सरान्तो महीयां-

स्तं त्वेशानं क्षेमधाम प्रपद्ये॥ २६

yo'yaṃ kālastasya te'vyaktabandho

ceṣṭāmāhuśceṣṭate yena viśvam|

nimeṣādirvatsarānto mahīyāṃ-

staṃ tveśānaṃ kṣemadhāma prapadye|| 26

अर्थ

प्रकृतिके एकमात्र सहायक प्रभो! निमेषसे लेकर वर्षपर्यन्त अनेक विभागोंमें विभक्त जो काल है, जिसकी चेष्टासे यह सम्पूर्ण विश्‍व सचेष्ट हो रहा है और जिसकी कोई सीमा नहीं है, वह आपकी लीलामात्र है। आप सर्वशक्तिमान् और परम कल्याणके आश्रय हैं। मैं आपकी शरण लेती हूँ॥ २६॥

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