श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने

महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु।

व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते

भवानेकः शिष्यते शेषसंज्ञः॥ २५

naṣṭe loke dviparārdhāvasāne

mahābhūteṣvādibhūtaṃ gateṣu|

vyakte'vyaktaṃ kālavegena yāte

bhavānekaḥ śiṣyate śeṣasaṃjñaḥ|| 25

अर्थ

जिस समय ब्रह्माकी पूरी आयु—दो परार्ध समाप्त हो जाते हैं, काल शक्तिके प्रभावसे सारे लोक नष्ट हो जाते हैं, पंच महाभूत अहंकारमें, अहंकार महत्तत्त्वमें और महत्तत्त्व प्रकृतिमें लीन हो जाता है—उस समय एकमात्र आप ही शेष रह जाते हैं। इसीसे आपका एक नाम ‘शेष’ भी है॥ २५॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें