श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

यर्ह्यम्बुजाक्ष तव पादतलं रमाया ✎ 1155

दत्तक्षणं क्वचिदरण्यजनप्रियस्य।

अस्प्राक्ष्म तत्प्रभृति नान्यसमक्षमङ्ग

स्थातुं त्वयाभिरमिता बत पारयामः॥ ३६

yarhyambujākṣa tava pādatalaṃ ramāyā

dattakṣaṇaṃ kvacidaraṇyajanapriyasya|

asprākṣma tatprabhṛti nānyasamakṣamaṅga

sthātuṃ tvayābhiramitā bata pārayāmaḥ|| 36

अर्थ

प्यारे कमलनयन! तुम वनवासियोंके प्यारे हो और वे भी तुमसे बहुत प्रेम करते हैं। इससे प्रायः तुम उन्हींके पास रहते हो। यहाँतक कि तुम्हारे जिन चरणकमलोंकी सेवाका अवसर स्वयं लक्ष्मीजीको कभी-कभी ही मिलता है, उन्हीं चरणोंका स्पर्श हमें प्राप्त हुआ। जिस दिन यह सौभाग्य हमें मिला और तुमने हमें स्वीकार करके आनन्दित किया, उसी दिनसे हम और किसीके सामने एक क्षणके लिये भी ठहरनेमें असमर्थ हो गयी हैं—पति-पुत्रादिकोंकी सेवा तो दूर रही॥ ३६॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1155 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): रमाय → रमाया

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