श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

श्रवणाद् दर्शनाद् ध्यानान्मयि भावोऽनुकीर्तनात्।

न तथा सन्‍निकर्षेण प्रतियात ततो गृहान्॥ २७

śravaṇād darśanād dhyānānmayi bhāvo'nukīrtanāt|

na tathā sannikarṣeṇa pratiyāta tato gṛhān|| 27

अर्थ

गोपियो! मेरी लीला और गुणोंके श्रवणसे, रूपके दर्शनसे, उन सबके कीर्तन और ध्यानसे मेरे प्रति जैसे अनन्य प्रेमकी प्राप्ति होती है, वैसे प्रेमकी प्राप्ति पास रहनेसे नहीं होती। इसलिये तुमलोग अभी अपने-अपने घर लौट जाओ॥ २७॥

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