श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

अस्वर्ग्यमयशस्यं च फल्गु कृच्छ्रं भयावहम्।

जुगुप्सितं च सर्वत्र औपपत्यं कुलस्त्रियाः॥ २६

asvargyamayaśasyaṃ ca phalgu kṛcchraṃ bhayāvaham|

jugupsitaṃ ca sarvatra aupapatyaṃ kulastriyāḥ|| 26

अर्थ

कुलीन स्त्रियोंके लिये जार पुरुषकी सेवा सब तरहसे निन्दनीय ही है। इससे उनका परलोक बिगड़ता है, स्वर्ग नहीं मिलता, इस लोकमें अपयश होता है। यह कुकर्म स्वयं तो अत्यन्त तुच्छ, क्षणिक है ही; इसमें प्रत्यक्ष—वर्तमानमें भी कष्ट-ही-कष्ट है। मोक्ष आदिकी तो बात ही कौन करे, यह साक्षात् परम भय—नरक आदिका हेतु है॥ २६॥✎ 1818

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1818 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): सेवा → और सतियोंकी सेवा

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