श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.28.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

तं गृहीत्वानयद् भृत्यो वरुणस्यासुरोऽन्तिकम्।

अविज्ञायासुरीं वेलां प्रविष्टमुदकं निशि॥ २

taṃ gṛhītvānayad bhṛtyo varuṇasyāsuro'ntikam|

avijñāyāsurīṃ velāṃ praviṣṭamudakaṃ niśi|| 2

अर्थ

नन्दबाबाको यह मालूम नहीं था कि यह असुरोंकी वेला है, इसलिये वे रातके समय ही यमुनाजलमें घुस गये। उस समय वरुणके सेवक एक असुरने उन्हें पकड़ लिया और वह अपने स्वामीके पास ले गया॥ २॥✎ 886

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #886 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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