श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! नन्दबाबाने कार्तिक शुक्ल एकादशीका उपवास किया और भगवान्की पूजा की तथा उसी दिन रातमें द्वादशी लगनेपर स्नान करनेके लिये यमुना-जलमें प्रवेश किया॥ १॥✎ 886
एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्।
स्नातुं नन्दस्तु कालिन्द्या द्वादश्यां जलमाविशत्॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! नन्दबाबाने कार्तिक शुक्ल एकादशीका उपवास किया और भगवान्की पूजा की तथा उसी दिन रातमें द्वादशी लगनेपर स्नान करनेके लिये यमुना-जलमें प्रवेश किया॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.28.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 304) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/28/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)