श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.27.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

स त्वं ममैश्‍वर्यमदप्लुतस्य

कृतागसस्तेऽविदुषः प्रभावम्।

क्षन्तुं प्रभोऽथार्हसि मूढचेतसो

मैवं पुनर्भून्मतिरीश मेऽसती॥ ८

sa tvaṃ mamaiśvaryamadaplutasya

kṛtāgasaste'viduṣaḥ prabhāvam|

kṣantuṃ prabho'thārhasi mūḍhacetaso

maivaṃ punarbhūnmatirīśa me'satī|| 8

अर्थ

प्रभो! मैंने ऐश्‍वर्यके मदसे चूर होकर आपका अपराध किया है; क्योंकि मैं आपकी शक्ति और प्रभावके सम्बन्धमें बिलकुल अनजान था। परमेश्‍वर! आप कृपा करके मुझ मूर्ख अपराधीका यह अपराध क्षमा करें और ऐसी कृपा करें कि मुझे फिर कभी ऐसे दुष्ट अज्ञानका शिकार न होना पड़े॥ ८॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें