श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.27.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

एवं कृष्णमुपामन्त्र्य सुरभिः पयसाऽऽत्मनः।✎ 2085

जलैराकाशगङ्गाया ऐरावतकरोद‍्धृतैः॥ २२

evaṃ kṛṣṇamupāmantrya surabhiḥ payasā''tmanaḥ|

jalairākāśagaṅgāyā airāvatakaroddhṛtaiḥ|| 22

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर कामधेनुने अपने दूधसे और देवमाताओंकी प्रेरणासे देवराज इन्द्रने ऐरावतकी सूँडके द्वारा लाये हुए आकाशगंगाके जलसे देवर्षियोंके साथ यदुनाथ श्रीकृष्णका अभिषेक किया और उन्हें ‘गोविन्द’ नामसे सम्बोधित किया॥ २२-२३॥

यह अर्थ श्लोक 22–23 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2085 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): मन्त्रॺ सुर → मन्त्र्य सुर

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