॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.27.12
मयेदं भगवन् गोष्ठनाशायासारवायुभिः।
चेष्टितं विहते यज्ञे मानिना तीव्रमन्युना॥ १२
mayedaṃ bhagavan goṣṭhanāśāyāsāravāyubhiḥ|
ceṣṭitaṃ vihate yajñe māninā tīvramanyunā|| 12
अर्थ
भगवन्! मेरे अभिमानका अन्त नहीं है और मेरा क्रोध भी बहुत ही तीव्र, मेरे वशके बाहर है। जब मैंने देखा कि मेरा यज्ञ तो नष्ट कर दिया गया, तब मैंने मूसलधार वर्षा और आँधीके द्वारा सारे व्रजमण्डलको नष्ट कर देना चाहा॥ १२॥