श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.26.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

देवे वर्षति यज्ञविप्लवरुषा वज्राश्मपर्षानिलैः

सीदत्पालपशुस्त्रि आत्मशरणं दृष्ट्वानुकम्प्युत्स्मयन् ।

उत्पाट्यैककरेण शैलमबलो लीलोच्छिलीन्ध्रं यथा

बिभ्रद् गोष्ठमपान्महेन्द्रमदभित् प्रीयान्‍न इन्द्रो गवाम्॥ २५

deve varṣati yajñaviplavaruṣā vajrāśmaparṣānilaiḥ

sīdatpālapaśustri ātmaśaraṇaṃ dṛṣṭvānukampyutsmayan |

utpāṭyaikakareṇa śailamabalo līlocchilīndhraṃ yathā

bibhrad goṣṭhamapānmahendramadabhit prīyānna indro gavām|| 25

अर्थ

जिस समय अपना यज्ञ भंग हो जानेके कारण इन्द्र क्रोधके मारे आग-बबूला हो गये थे और मूसलधार वर्षा करने लगे थे, उस समय वज्रपात, ओलोंकी बौछार और प्रचण्ड आँधीसे स्त्री, पशु तथा ग्वाले अत्यन्त पीड़ित हो गये थे। अपनी शरणमें रहनेवाले व्रजवासियोंकी यह दशा देखकर भगवान्‌का हृदय करुणासे भर आया। परन्तु फिर एक नयी लीला करनेके विचारसे वे तुरंत ही मुसकराने लगे। जैसे कोई नन्हा-सा निर्बल बालक खेल-खेलमें ही बरसाती छत्तेका पुष्प उखाड़ ले, वैसे ही उन्होंने एक हाथसे ही गिरिराज गोवर्द्धनको उखाड़कर धारण कर लिया और सारे व्रजकी रक्षा की। इन्द्रका मद चूर करनेवाले वे ही भगवान् गोविन्द हमपर प्रसन्‍न हों॥ २५॥✎ 2083

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे
पूर्वार्धे षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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