श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.26.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

आशीविषतमाहीन्द्रं दमित्वा विमदं ह्रदात्।✎ 1153

प्रसह्योद्वास्य यमुनां चक्रेऽसौ निर्विषोदकाम्॥ १२

āśīviṣatamāhīndraṃ damitvā vimadaṃ hradāt|

prasahyodvāsya yamunāṃ cakre'sau nirviṣodakām|| 12

अर्थ

यमुनाजलमें रहनेवाला कालियनाग कितना विषैला था? परन्तु इसने उसका भी मान मर्दन कर उसे बलपूर्वक दहसे निकाल दिया और यमुनाजीका जल सदाके लिये विषरहित—अमृतमय बना दिया॥ १२॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1153 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदात्। → ह्रदात्।

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