श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.25.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इत्थं मघवताऽऽज्ञप्ता मेघा निर्मुक्तबन्धनाः।

नन्दगोकुलमासारैः पीडयामासुरोजसा॥ ८

itthaṃ maghavatā''jñaptā meghā nirmuktabandhanāḥ|

nandagokulamāsāraiḥ pīḍayāmāsurojasā|| 8

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इन्द्रने इस प्रकार प्रलयके मेघोंको आज्ञा दी और उनके बन्धन खोल दिये। अब वे बड़े वेगसे नन्दबाबाके व्रजपर चढ़ आये और मूसलधार पानी बरसाकर सारे व्रजको पीड़ित करने लगे॥ ८॥✎ 2081 2082

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #2081 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2082 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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