श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.25.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

वाचालं बालिशं स्तब्धमज्ञं पण्डितमानिनम्।

कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम्॥ ५

vācālaṃ bāliśaṃ stabdhamajñaṃ paṇḍitamāninam|

kṛṣṇaṃ martyamupāśritya gopā me cakrurapriyam|| 5

अर्थ

कृष्ण बकवादी, नादान, अभिमानी और मूर्ख होनेपर भी अपनेको बहुत बड़ा ज्ञानी समझता है। वह स्वयं मृत्युका ग्रास है। फिर भी उसीका सहारा लेकर इन अहीरोंने मेरी अवहेलना की है॥ ५॥

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