vācayitvā svastyayanaṃ tad dravyeṇa giridvijān|| 32
अर्थ
भगवान् श्रीकृष्णने जिस प्रकारका यज्ञ करनेको कहा था, वैसा ही यज्ञ उन्होंने प्रारम्भ किया। पहले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर उसी सामग्रीसे गिरिराज और ब्राह्मणोंको सादर भेंटें दीं तथा गौओंको हरी-हरी घास खिलायीं। इसके बाद नन्दबाबा आदि गोपोंने गौओंको आगे करके गिरिराजकी प्रदक्षिणा की॥ ३२-३३॥✎ 2080
यह अर्थ श्लोक 32–33 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
तथा च व्यदधुः सर्वं यथाऽऽह मधुसूदनः।
वाचयित्वा स्वस्त्ययनं तद् द्रव्येण गिरिद्विजान्॥ ३२
भगवान् श्रीकृष्णने जिस प्रकारका यज्ञ करनेको कहा था, वैसा ही यज्ञ उन्होंने प्रारम्भ किया। पहले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर उसी सामग्रीसे गिरिराज और ब्राह्मणोंको सादर भेंटें दीं तथा गौओंको हरी-हरी घास खिलायीं। इसके बाद नन्दबाबा आदि गोपोंने गौओंको आगे करके गिरिराजकी प्रदक्षिणा की॥ ३२-३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.24.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 292) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/24/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)