श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.24.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

कालात्मना भगवता शक्रदर्पं जिघांसता।

प्रोक्तं निशम्य नन्दाद्याः साध्वगृह्णन्त तद्वचः॥ ३१

kālātmanā bhagavatā śakradarpaṃ jighāṃsatā|

proktaṃ niśamya nandādyāḥ sādhvagṛhṇanta tadvacaḥ|| 31

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कालात्मा भगवान्‌की इच्छा थी कि इन्द्रका घमण्ड चूर-चूर कर दें। नन्दबाबा आदि गोपोंने उनकी बात सुनकर बड़ी प्रसन्‍नतासे स्वीकार कर ली॥ ३१॥✎ 2080

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