श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इत्युक्ता द्विजपत्‍न्यस्ता यज्ञवाटं पुनर्गताः।

ते चानसूयवः स्वाभिः स्त्रीभिः सत्रमपारयन्॥ ३३

ityuktā dvijapatnyastā yajñavāṭaṃ punargatāḥ|

te cānasūyavaḥ svābhiḥ strībhiḥ satramapārayan|| 33

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान्‌ने इस प्रकार कहा, तब वे ब्राह्मणपत्‍नियाँ यज्ञशालामें लौट गयीं। उन ब्राह्मणोंने अपनी स्त्रियोंमें तनिक भी दोषदृष्टि नहीं की। उनके साथ मिलकर अपना यज्ञ पूरा किया॥ ३३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें