te cānasūyavaḥ svābhiḥ strībhiḥ satramapārayan|| 33
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान्ने इस प्रकार कहा, तब वे ब्राह्मणपत्नियाँ यज्ञशालामें लौट गयीं। उन ब्राह्मणोंने अपनी स्त्रियोंमें तनिक भी दोषदृष्टि नहीं की। उनके साथ मिलकर अपना यज्ञ पूरा किया॥ ३३॥
इत्युक्ता द्विजपत्न्यस्ता यज्ञवाटं पुनर्गताः।
ते चानसूयवः स्वाभिः स्त्रीभिः सत्रमपारयन्॥ ३३
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब भगवान्ने इस प्रकार कहा, तब वे ब्राह्मणपत्नियाँ यज्ञशालामें लौट गयीं। उन ब्राह्मणोंने अपनी स्त्रियोंमें तनिक भी दोषदृष्टि नहीं की। उनके साथ मिलकर अपना यज्ञ पूरा किया॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.23.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 286) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/23/33/