श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

न प्रीतयेऽनुरागाय ह्यंगसंगो नृणामिह।

तन्मनो मयि युंजाना अचिरान्मामवाप्स्यथ॥ ३२

na prītaye'nurāgāya hyaṃgasaṃgo nṛṇāmiha|

tanmano mayi yuṃjānā acirānmāmavāpsyatha|| 32

अर्थ

देवियो! इस संसारमें मेरा अंग-संग ही मनुष्योंमें मेरी प्रीति या अनुरागका कारण नहीं है। इसलिये तुम जाओ, अपना मन मुझमें लगा दो। तुम्हें बहुत शीघ्र मेरी प्राप्ति हो जायगी॥ ३२॥

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