देवियो! इस संसारमें मेरा अंग-संग ही मनुष्योंमें मेरी प्रीति या अनुरागका कारण नहीं है। इसलिये तुम जाओ, अपना मन मुझमें लगा दो। तुम्हें बहुत शीघ्र मेरी प्राप्ति हो जायगी॥ ३२॥
न प्रीतयेऽनुरागाय ह्यंगसंगो नृणामिह।
तन्मनो मयि युंजाना अचिरान्मामवाप्स्यथ॥ ३२
देवियो! इस संसारमें मेरा अंग-संग ही मनुष्योंमें मेरी प्रीति या अनुरागका कारण नहीं है। इसलिये तुम जाओ, अपना मन मुझमें लगा दो। तुम्हें बहुत शीघ्र मेरी प्राप्ति हो जायगी॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.23.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 286) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/23/32/