वे प्रतिदिन उषाकालमें ही नाम ले-लेकर एक-दूसरी सखीको पुकार लेतीं और परस्पर हाथमें-हाथ डालकर ऊँचे स्वरसे भगवान् श्रीकृष्णकी लीला तथा नामोंका गान करती हुई यमुनाजलमें स्नान करनेके लिये जातीं॥ ६॥✎ 14261427
उषस्युत्थाय गोत्रैः स्वैरन्योन्याबद्धबाहवः।
कृष्णमुच्चैर्जगुर्यान्त्यः कालिन्द्यां स्नातुमन्वहम्॥ ६
वे प्रतिदिन उषाकालमें ही नाम ले-लेकर एक-दूसरी सखीको पुकार लेतीं और परस्पर हाथमें-हाथ डालकर ऊँचे स्वरसे भगवान् श्रीकृष्णकी लीला तथा नामोंका गान करती हुई यमुनाजलमें स्नान करनेके लिये जातीं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.22.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 271) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/22/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)