श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्‍वरि।

नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः।

इति मन्त्रं जपन्त्यस्ताः पूजां चक्रुः कुमारिकाः॥ ४

kātyāyani mahāmāye mahāyoginyadhīśvari|

nandagopasutaṃ devi patiṃ me kuru te namaḥ|

iti mantraṃ japantyastāḥ pūjāṃ cakruḥ kumārikāḥ|| 4

अर्थ

साथ ही ‘हे कात्यायनी! हे महामाये! हे महायोगिनी! हे सबकी एकमात्र स्वामिनी! आप नन्दनन्दन श्रीकृष्णको हमारा पति बना दीजिये। देवि! हम आपके चरणोंमें नमस्कार करती हैं।’—इस मन्त्रका जप करती हुई वे कुमारियाँ देवीकी आराधना करतीं॥ ४॥✎ 1426 1427

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1426 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: हाथ-में-हाथ → हाथमें-हाथ
  • #1427 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): की → कीं

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