साथ ही ‘हे कात्यायनी! हे महामाये! हे महायोगिनी! हे सबकी एकमात्र स्वामिनी! आप नन्दनन्दन श्रीकृष्णको हमारा पति बना दीजिये। देवि! हम आपके चरणोंमें नमस्कार करती हैं।’—इस मन्त्रका जप करती हुई वे कुमारियाँ देवीकी आराधना करतीं॥ ४॥✎ 14261427
कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि।
नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः।
इति मन्त्रं जपन्त्यस्ताः पूजां चक्रुः कुमारिकाः॥ ४
साथ ही ‘हे कात्यायनी! हे महामाये! हे महायोगिनी! हे सबकी एकमात्र स्वामिनी! आप नन्दनन्दन श्रीकृष्णको हमारा पति बना दीजिये। देवि! हम आपके चरणोंमें नमस्कार करती हैं।’—इस मन्त्रका जप करती हुई वे कुमारियाँ देवीकी आराधना करतीं॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.22.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 271) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/22/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)