॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.22.33
अहो एषां वरं जन्म सर्वप्राण्युपजीवनम्।
सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः॥ ३३
aho eṣāṃ varaṃ janma sarvaprāṇyupajīvanam|
sujanasyeva yeṣāṃ vai vimukhā yānti nārthinaḥ|| 33
अर्थ
मैं कहता हूँ कि इन्हींका जीवन सबसे श्रेष्ठ है। क्योंकि इनके द्वारा सब प्राणियोंको सहारा मिलता है, उनका जीवन-निर्वाह होता है। जैसे किसी सज्जन पुरुषके घरसे कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता, वैसे ही इन वृक्षोंसे भी सभीको कुछ-न-कुछ मिल ही जाता है॥ ३३॥