श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

पश्यतैतान् महाभागान् परार्थैकान्तजीवितान्।

वातवर्षातपहिमान् सहन्तो वारयन्ति नः॥ ३२

paśyataitān mahābhāgān parārthaikāntajīvitān|

vātavarṣātapahimān sahanto vārayanti naḥ|| 32

अर्थ

‘मेरे प्यारे मित्रो! देखो, ये वृक्ष कितने भाग्यवान् हैं! इनका सारा जीवन केवल दूसरोंकी भलाई करनेके लिये ही है। ये स्वयं तो हवाके झोंके, वर्षा, धूप और पाला—सब कुछ सहते हैं, परन्तु हम लोगोंकी उनसे रक्षा करते हैं॥ ३२॥

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