‘प्यारे श्रीकृष्ण! तुम ऐसी अनीति मत करो। हम जानती हैं कि तुम नन्दबाबाके लाड़ले लाल हो। हमारे प्यारे हो। सारे व्रजवासी तुम्हारी सराहना करते रहते हैं। देखो, हम जाड़ेके मारे ठिठुर रही हैं। तुम हमें हमारे वस्त्र दे दो॥ १४॥✎ 1981
मानयं भोः कृथास्त्वां तु नन्दगोपसुतं प्रियम्।
जानीमोऽङ्ग व्रजश्लाघ्यं देहि वासांसि वेपिताः॥ १४
‘प्यारे श्रीकृष्ण! तुम ऐसी अनीति मत करो। हम जानती हैं कि तुम नन्दबाबाके लाड़ले लाल हो। हमारे प्यारे हो। सारे व्रजवासी तुम्हारी सराहना करते रहते हैं। देखो, हम जाड़ेके मारे ठिठुर रही हैं। तुम हमें हमारे वस्त्र दे दो॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.22.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 272) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/22/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1981 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): ठंढे → ठंडे