श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.21.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

इति वेणुरवं राजन् सर्वभूतमनोहरम्।

श्रुत्वा व्रजस्त्रियः सर्वा वर्णयन्त्योऽभिरेभिरे॥ ६

iti veṇuravaṃ rājan sarvabhūtamanoharam|

śrutvā vrajastriyaḥ sarvā varṇayantyo'bhirebhire|| 6

अर्थ

परीक्षित्! यह वंशीध्वनि जड, चेतन—समस्त भूतोंका मन चुरा लेती है। गोपियोंने उसे सुना और सुनकर उसका वर्णन करने लगीं। वर्णन करते-करते वे तन्मय हो गयीं और श्रीकृष्णको पाकर आलिंगन करने लगीं॥ ६॥✎ 884

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #884 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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