श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.21.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारं

बिभ्रद् वासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्।

रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दै-

र्वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥ ५

barhāpīḍaṃ naṭavaravapuḥ karṇayoḥ karṇikāraṃ

bibhrad vāsaḥ kanakakapiśaṃ vaijayantīṃ ca mālām|

randhrān veṇoradharasudhayā pūrayan gopavṛndai-

rvṛndāraṇyaṃ svapadaramaṇaṃ prāviśad gītakīrtiḥ|| 5

अर्थ

(वे मन-ही-मन देखने लगीं कि) श्रीकृष्ण ग्वालबालोंके साथ वृन्दावनमें प्रवेश कर रहे हैं। उनके सिरपर मयूरपिच्छ है और कानोंपर कनेरके पीले-पीले पुष्प; शरीरपर सुनहला पीताम्बर और गलेमें पाँच प्रकारके सुगन्धित पुष्पोंकी बनी वैजयन्ती माला है। रंगमंचपर अभिनय करते हुए श्रेष्ठ नटका-सा क्या ही सुन्दर वेष है। बाँसुरीके छिद्रोंको वे अपने अधरामृतसे भर रहे हैं। उनके पीछे-पीछे ग्वालबाल उनकी लोकपावन कीर्तिका गान कर रहे हैं। इस प्रकार वैकुण्ठसे भी श्रेष्ठ वह वृन्दावनधाम उनके चरणचिह्नोंसे और भी रमणीय बन गया है॥ ५॥✎ 884

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #884 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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