श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सा देवकी सर्वजगन्‍निवास-

निवासभूता नितरां न रेजे।

भोजेन्द्रगेहेऽग्‍निशिखेव रुद्धा

सरस्वती ज्ञानखले यथा सती॥ १९

sā devakī sarvajagannivāsa-

nivāsabhūtā nitarāṃ na reje|

bhojendragehe'gniśikheva ruddhā

sarasvatī jñānakhale yathā satī|| 19

अर्थ

भगवान् सारे जगत‍्के निवासस्थान हैं। देवकी उनका भी निवासस्थान बन गयी। परन्तु घड़े आदिके भीतर बंद किये हुए दीपकका और अपनी विद्या दूसरेको न देनेवाले ज्ञानखलकी श्रेष्ठ विद्याका प्रकाश जैसे चारों ओर नहीं फैलता, वैसे ही कंसके कारागारमें बंद देवकीकी भी उतनी शोभा नहीं हुई॥ १९॥

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