॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.2.18
ततो जगन्मंगलमच्युतांशं
समाहितं शूरसुतेन देवी।
दधार सर्वात्मकमात्मभूतं
काष्ठा यथाऽऽनन्दकरं मनस्तः॥ १८
tato jaganmaṃgalamacyutāṃśaṃ
samāhitaṃ śūrasutena devī|
dadhāra sarvātmakamātmabhūtaṃ
kāṣṭhā yathā''nandakaraṃ manastaḥ|| 18
अर्थ
भगवान्के उस ज्योतिर्मय अंशको, जो जगत्का परम मंगल करनेवाला है, वसुदेवजीके द्वारा आधान किये जानेपर देवी देवकीने ग्रहण किया। जैसे पूर्वदिशा चन्द्रदेवको धारण करती है, वैसे ही शुद्ध सत्त्वसे सम्पन्न देवी देवकीने विशुद्ध मनसे सर्वात्मा एवं आत्मस्वरूप भगवान्को धारण किया॥ १८॥