भगवान्की आज्ञा सुनकर उन ग्वालबालोंने कहा ‘बहुत अच्छा’ और अपनी आँखें मूँद लीं। तब योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने उस भयंकर आगको अपने मुँहसे पी लिया* और इस प्रकार उन्हें उस घोर संकटसे छुड़ा दिया॥ १२॥✎ 1932
तथेति मीलिताक्षेषु भगवानग्निमुल्बणम्।
पीत्वा मुखेन तान् कृच्छ्राद् योगाधीशो व्यमोचयत्॥ १२
भगवान्की आज्ञा सुनकर उन ग्वालबालोंने कहा ‘बहुत अच्छा’ और अपनी आँखें मूँद लीं। तब योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने उस भयंकर आगको अपने मुँहसे पी लिया और इस प्रकार उन्हें उस घोर संकटसे छुड़ा दिया॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.19.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 258) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/19/12/
टिप्पणियाँ
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१. भगवान् श्रीकृष्ण भक्तोंके द्वारा अर्पित प्रेम-भक्ति-सुधा-रसका पान करते हैं। अग्निके मनमें उसीका स्वाद लेनेकी लालसा हो आयी। इसलिये उसने स्वयं ही मुखमें प्रवेश किया।
२. विषाग्नि, मुंजाग्नि और दावाग्नि—तीनोंका पान करके भगवान्ने अपनी त्रितापनाशकी शक्ति व्यक्त की।
३. पहले रात्रिमें अग्निपान किया था, दूसरी बार दिनमें। भगवान् अपने भक्तजनोंका ताप हरनेके लिये सदा तत्पर रहते हैं।
४. पहली बार सबके सामने और दूसरी बार सबकी आँखें बंद कराके श्रीकृष्णने अग्निपान किया। इसका अभिप्राय यह है कि भगवान् परोक्ष और अपरोक्ष दोनों ही प्रकारसे वे भक्तजनोंका हित करते हैं।
(मुद्रित पृष्ठ 258)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1932 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): दावा-नलसे → दावानलसे