॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.17.25
इत्थं स्वजनवैक्लव्यं निरीक्ष्य जगदीश्वरः।
तमग्निमपिबत्तीव्रमनन्तोऽनन्तशक्तिधृक्॥ २५
itthaṃ svajanavaiklavyaṃ nirīkṣya jagadīśvaraḥ|
tamagnimapibattīvramananto'nantaśaktidhṛk|| 25
अर्थ
भगवान् अनन्त हैं; वे अनन्त शक्तियोंको धारण करते हैं, उन जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्णने जब देखा कि मेरे स्वजन इस प्रकार व्याकुल हो रहे हैं तब वे उस भयंकर आगको पी गये*॥ २५॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे
दावाग्निमोचनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥
टिप्पणियाँ
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अग्नि-पान
१. मैं सबका दाह दूर करनेके लिये ही अवतीर्ण हुआ हूँ। इसलिये यह दाह दूर करना भी मेरा कर्तव्य है।
२. रामावतारमें श्रीजानकीजीको सुरक्षित रखकर अग्निने मेरा उपकार किया था। अब उसको अपने मुखमें स्थापित करके उसका सत्कार करना कर्तव्य है।
३. कार्यका कारणमें लय होता है। भगवान्के मुखसे अग्नि प्रकट हुआ—मुखाद् अग्निरजायत। इसलिये भगवान्ने उसे मुखमें ही स्थापित किया।
४. मुखके द्वारा अग्नि शान्त करके यह भाव प्रकट किया कि भव-दावाग्निको शान्त करनेमें भगवान्के मुख-स्थानीय ब्राह्मण ही समर्थ हैं।