tāṃ rātriṃ tatra rājendra kṣuttṛḍbhyāṃ śramakarśitāḥ|
ūṣurvrajaukaso gāvaḥ kālindyā upakūlataḥ|| 20
अर्थ
राजेन्द्र! व्रजवासी और गौएँ सब बहुत ही थक गये थे। ऊपरसे भूख-प्यास भी लग रही थी। इसलिये उस रात वे व्रजमें नहीं गये, वहीं यमुनाजीके तटपर सो रहे॥ २०॥
तां रात्रिं तत्र राजेन्द्र क्षुत्तृड्भ्यां श्रमकर्शिताः।
ऊषुर्व्रजौकसो गावः कालिन्द्या उपकूलतः॥ २०
राजेन्द्र! व्रजवासी और गौएँ सब बहुत ही थक गये थे। ऊपरसे भूख-प्यास भी लग रही थी। इसलिये उस रात वे व्रजमें नहीं गये, वहीं यमुनाजीके तटपर सो रहे॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.17.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 251) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/17/20/