श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.17.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

यशोदापि महाभागा नष्टलब्धप्रजा सती।

परिष्वज्याङ्कमारोप्य मुमोचाश्रुकलां मुहुः॥ १९

yaśodāpi mahābhāgā naṣṭalabdhaprajā satī|

pariṣvajyāṅkamāropya mumocāśrukalāṃ muhuḥ|| 19

अर्थ

परम सौभाग्यवती देवी यशोदाने भी कालके गालसे बचे हुए अपने लालको गोदमें लेकर हृदयसे चिपका लिया। उनकी आँखोंसे आनन्दके आँसुओंकी बूँदें बार-बार टपकी पड़ती थीं॥ १९॥

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