धीरे-धीरे कालिय नागकी इन्द्रियों और प्राणोंमें कुछ-कुछ चेतना आ गयी। वह बड़ी कठिनतासे श्वास लेने लगा और थोड़ी देरके बाद बड़ी दीनतासे हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोला॥ ५५॥
प्रतिलब्धेन्द्रियप्राणः कालियः शनकैर्हरिम्।
कृच्छ्रात् समुच्छ्वसन् दीनः कृष्णं प्राह कृतांजलिः॥ ५५
धीरे-धीरे कालिय नागकी इन्द्रियों और प्राणोंमें कुछ-कुछ चेतना आ गयी। वह बड़ी कठिनतासे श्वास लेने लगा और थोड़ी देरके बाद बड़ी दीनतासे हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोला॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.16.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 247) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/16/55/