श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.54

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इत्थं स नागपत्‍नीभिर्भगवान् समभिष्टुतः।

मूर्च्छितं भ‌ग्‍नशिरसं विससर्जाङ्‌घ्रिकुट्टनैः॥ ५४

itthaṃ sa nāgapatnībhirbhagavān samabhiṣṭutaḥ|

mūrcchitaṃ bhagnaśirasaṃ visasarjāṅghrikuṭṭanaiḥ|| 54

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान्‌के चरणोंकी ठोकरोंसे कालिय नागके फण छिन्‍न-भिन्‍न हो गये थे। वह बेसुध हो रहा था। जब नागपत्‍नियोंने इस प्रकार भगवान्‌की स्तुति की, तब उन्होंने दया करके उसे छोड़ दिया॥ ५४॥

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