॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.16.5
विप्रुष्मता विषोदोर्मिमारुतेनाभिमर्शिताः।
म्रियन्ते तीरगा यस्य प्राणिनः स्थिरजंगमाः॥ ५
vipruṣmatā viṣodormimārutenābhimarśitāḥ|
mriyante tīragā yasya prāṇinaḥ sthirajaṃgamāḥ|| 5
अर्थ
उसके विषैले जलकी उत्ताल तरंगोंका स्पर्श करके तथा उसकी छोटी-छोटी बूँदें लेकर जब वायु बाहर आती और तटके घास-पात, वृक्ष, पशु-पक्षी आदिका स्पर्श करती, तब वे उसी समय मर जाते थे॥ ५॥✎ 2075