श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

विप्रुष्मता विषोदोर्मिमारुतेनाभिमर्शिताः।

म्रियन्ते तीरगा यस्य प्राणिनः स्थिरजंगमाः॥ ५

vipruṣmatā viṣodormimārutenābhimarśitāḥ|

mriyante tīragā yasya prāṇinaḥ sthirajaṃgamāḥ|| 5

अर्थ

उसके विषैले जलकी उत्ताल तरंगोंका स्पर्श करके तथा उसकी छोटी-छोटी बूँदें लेकर जब वायु बाहर आती और तटके घास-पात, वृक्ष, पशु-पक्षी आदिका स्पर्श करती, तब वे उसी समय मर जाते थे॥ ५॥✎ 2075

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2075 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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