श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.46

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मच्छादनाय च।

गुणवृत्त्युपलक्ष्याय गुणद्रष्ट्रे स्वसंविदे॥ ४६

namo guṇapradīpāya guṇātmacchādanāya ca|

guṇavṛttyupalakṣyāya guṇadraṣṭre svasaṃvide|| 46

अर्थ

आप अन्तःकरण और उसकी वृत्तियोंके प्रकाशक हैं और उन्हींके द्वारा अपने-आपको ढक रखते हैं। उन अन्तःकरण और वृत्तियोंके द्वारा ही आपके स्वरूपका कुछ-कुछ संकेत भी मिलता है। आप उन गुणों और उनकी वृत्तियोंके साक्षी तथा स्वयंप्रकाश हैं। हम आपको नमस्कार करती हैं॥ ४६॥

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