श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तच्चित्रताण्डवविरुग्णफणातपत्रो

रक्तं मुखैरुरु वमन् नृप भ‌ग्‍नगात्रः।

स्मृत्वा चराचरगुरुं पुरुषं पुराणं

नारायणं तमरणं मनसा जगाम॥ ३०

taccitratāṇḍavavirugṇaphaṇātapatro

raktaṃ mukhairuru vaman nṛpa bhagnagātraḥ|

smṛtvā carācaraguruṃ puruṣaṃ purāṇaṃ

nārāyaṇaṃ tamaraṇaṃ manasā jagāma|| 30

अर्थ

परीक्षित्! भगवान्‌के इस अद्भुत ताण्डव-नृत्यसे कालियके फणरूप छत्ते छिन्‍न-भिन्‍न हो गये। उसका एक-एक अंग चूर-चूर हो गया और मुँहसे खूनकी उलटी होने लगी। अब उसे सारे जगत‍्के आदिशिक्षक पुराणपुरुष भगवान् नारायणकी स्मृति हुई। वह मन-ही-मन भगवान्‌की शरणमें गया॥ ३०॥✎ 1983 2076

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1983 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): पैंरोंकी → पैरोंकी
  • #2076 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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