श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तस्याक्षिभिर्गरलमुद्वमतः शिरस्सु

यद् यत् समुन्‍नमति निःश्‍वसतो रुषोच्चैः।

नृत्यन् पदानुनमयन् दमयाम्बभूव

पुष्पैः प्रपूजित इवेह पुमान् पुराणः॥ २९

tasyākṣibhirgaralamudvamataḥ śirassu

yad yat samunnamati niḥśvasato ruṣoccaiḥ|

nṛtyan padānunamayan damayāmbabhūva

puṣpaiḥ prapūjita iveha pumān purāṇaḥ|| 29

अर्थ

तनिक भी चेत होता तो वह अपनी आँखोंसे विष उगलने लगता और क्रोधके मारे जोर-जोरसे फुफकारें मारने लगता। इस प्रकार वह अपने सिरोंमेंसे जिस सिरको ऊपर उठाता, उसीको नाचते हुए भगवान् श्रीकृष्ण अपने चरणोंकी ठोकरसे झुकाकर रौंद डालते। उस समय पुराण-पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंपर जो खूनकी बूँदें पड़ती थीं, उनसे ऐसा मालूम होता, मानो रक्त-पुष्पोंसे उनकी पूजा की जा रही हो॥ २९॥✎ 1983 2076

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1983 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): पैंरोंकी → पैरोंकी
  • #2076 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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