॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.15.8
धन्येयमद्य धरणी तृणवीरुधस्त्वत्-
पादस्पृशो द्रुमलताः करजाभिमृष्टाः।
नद्योऽद्रयः खगमृगाः सदयावलोकै-
र्गोप्योऽन्तरेण भुजयोरपि यत्स्पृहा श्रीः॥ ८
dhanyeyamadya dharaṇī tṛṇavīrudhastvat-
pādaspṛśo drumalatāḥ karajābhimṛṣṭāḥ|
nadyo'drayaḥ khagamṛgāḥ sadayāvalokai-
rgopyo'ntareṇa bhujayorapi yatspṛhā śrīḥ|| 8
अर्थ
आज यहाँकी भूमि अपनी हरी-हरी घासके साथ आपके चरणोंका स्पर्श प्राप्त करके धन्य हो रही है। यहाँके वृक्ष, लताएँ और झाड़ियाँ आपकी अँगुलियोंका स्पर्श पाकर अपना अहोभाग्य मान रही हैं। आपकी दयाभरी चितवनसे नदी, पर्वत, पशु, पक्षी— सब कृतार्थ हो रहे हैं और व्रजकी गोपियाँ आपके वक्षःस्थलका स्पर्श प्राप्त करके, जिसके लिये स्वयं लक्ष्मी भी लालायित रहती हैं, धन्य-धन्य हो रही हैं॥ ८॥✎ 2073