॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.15.7
नृत्यन्त्यमी शिखिन ईड्य मुदा हरिण्यः
कुर्वन्ति गोप्य इव ते प्रियमीक्षणेन।
सूक्तैश्च कोकिलगणा गृहमागताय
धन्या वनौकस इयान् हि सतां निसर्गः॥ ७
nṛtyantyamī śikhina īḍya mudā hariṇyaḥ
kurvanti gopya iva te priyamīkṣaṇena|
sūktaiśca kokilagaṇā gṛhamāgatāya
dhanyā vanaukasa iyān hi satāṃ nisargaḥ|| 7
अर्थ
भाईजी! वास्तवमें आप ही स्तुति करनेयोग्य हैं। देखिये, आपको अपने घर आया देख ये मोर आपके दर्शनोंसे आनन्दित होकर नाच रहे हैं। हरिनियाँ मृगनयनी गोपियोंके समान अपनी प्रेमभरी तिरछी चितवनसे आपके प्रति प्रेम प्रकट कर रही हैं, आपको प्रसन्न कर रही हैं। ये कोयलें अपनी मधुर कुहू-कुहू ध्वनिसे आपका कितना सुन्दर स्वागत कर रही हैं! ये वनवासी होनेपर भी धन्य हैं। क्योंकि सत्पुरुषोंका स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे घर आये अतिथिको अपनी प्रिय-से-प्रिय वस्तु भेंट कर देते हैं॥ ७॥✎ 2073