श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.51

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

ते सम्प्रतीतस्मृतयः समुत्थाय जलान्तिकात्।

आसन् सुविस्मिताः सर्वे वीक्षमाणाः परस्परम्॥ ५१

te sampratītasmṛtayaḥ samutthāya jalāntikāt|

āsan suvismitāḥ sarve vīkṣamāṇāḥ parasparam|| 51

अर्थ

परीक्षित्! चेतना आनेपर वे सब यमुनाजीके तटपर उठ खड़े हुए और आश्‍चर्यचकित होकर एक-दूसरेकी ओर देखने लगे॥ ५१॥✎ 2074

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2074 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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