श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

बलस्य लीलयोत्सृष्टखरदेहहताहताः।

तालाश्‍चकम्पिरे सर्वे महावातेरिता इव॥ ३४

balasya līlayotsṛṣṭakharadehahatāhatāḥ|

tālāścakampire sarve mahāvāteritā iva|| 34

अर्थ

बलरामजीके लिये तो यह एक खेल था। परन्तु उनके द्वारा फेंके हुए गधेके शरीरसे चोट खा-खाकर वहाँ सब-के-सब ताड़ हिल गये। ऐसा जान पड़ा, मानो सबको झंझावातने झकझोर दिया हो॥ ३४॥

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