श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.58

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं

महत्पदं पुण्ययशो मुरारेः।

भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं

पदं पदं यद् विपदां न तेषाम्॥ ५८

samāśritā ye padapallavaplavaṃ

mahatpadaṃ puṇyayaśo murāreḥ|

bhavāmbudhirvatsapadaṃ paraṃ padaṃ

padaṃ padaṃ yad vipadāṃ na teṣām|| 58

अर्थ

जिन्होंने पुण्यकीर्ति मुकुन्द मुरारीके पदपल्लवकी नौकाका आश्रय लिया है, जो कि सत्पुरुषोंका सर्वस्व है, उनके लिये यह भवसागर बछड़ेके खुरके गढ़ेके समान है। उन्हें परमपदकी प्राप्ति हो जाती है और उनके लिये विपत्तियोंका निवासस्थान—यह संसार नहीं रहता॥ ५८॥

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